रंग-बिरंगी पत्रिकाओं और चौबीसों घंटे जुगाली करते चैनलों की भीड़ में सच का चेहरा कहीं गुम हो गया है. जो सच हमारे सामने आता है, उस सच का एक दूसरा पहलू भी है. अनिवार्य पहलू. वह सच जो बहुसंख्यक जनता का है, वंचितों का है, हम सबका है, उस सच से रू-ब-रू होना बहुत जरूरी है. समाज की दो प्रतिध्रुवीय स्थितियां प्रायः हमारे सामने आती रहती हैं. अरुंधति जनता के हितों का वकालत करने के कारण जेल जाती हैं, लेकिन हजारों लोगों की हत्या करवाने वाला मोदी छुट्टा घूमता रहता है; आंध्र प्रदेश में किसान आत्महत्याएं करते हैं, लेकिन हैदराबाद पर सिलिकॉन की परत चढ़ती जाती हैं; गोदामों में अनाज सड़ता रहता है, लेकिन कालाहांडी जैसी जगहों में भूख से होने वाली मौतों का सिलसिला थमता नहीं है; वंचितों-पिछड़ों के स्कूलों को एक छत भी नहीं है, लेकिन स्कूल लगातार माडर्न होते जा रहे हैं. संभवतः इसलिए तो धूमिल कहते हैं


 

एक आदमी है जो रोटी खाता है

एक आदमी है जो रोटी बेलता है

एक तीसरा आदमी है जो

न रोटी खाता है, न रोटी बेलता है

बल्कि रोटी से खेलता है

मैं पूछता हूँ यह तीसरा आदमी कौन है

मेरे देश की संसद मौन है

 

संसद मौन रहे तो रहे, पत्रकारिता का यह दायित्व होना चाहिए कि इस तीसरे आदमी को सामने लाए, उस सच को सामने लाए जो पीड़ादायक तो है लेकिन बहुजन से जुड़ा है. अगर आप अधूरे सच का प्रतिपक्ष बनाना चाहते हैं तो आपको आगे आना होगा. वैचारिक उन्मेष की जनोन्मुख पत्रिका मंडल विचार समरस समाज की संभावना को लेकर बड़ा आरंभ है, वास्तव में यह वंचितों की आकंक्षा का विस्तार है. सामाजिक समरसता का मानक मासिक मंडल विचार का अगर आप हाथ थामें तो यह एक आंदोलन में तब्दील हो सकता है.